भारत में डायलिसिस पर औसत सर्वाइवल विकसित देशों की तुलना में आम तौर पर कम माना जाता है, क्योंकि यहाँ देर से डायग्नोसिस, आर्थिक सीमाएँ, पोषण की कमी, इंफेक्शन, और नियमित डायलिसिस की उपलब्धता जैसी चुनौतियाँ बहुत सामान्य हैं।
उपलब्ध भारतीय डेटा के आधार पर, पहले 6–12 महीनों में ही एक उल्लेखनीय अनुपात मरीजों का या तो उपचार छूट जाने (treatment dropout) या मृत्यु के रूप में लॉस‑टू‑फॉलो‑अप हो जाता है, और लंबे समय में 5‑year survival कई सेंटरों में 30–40% या उससे कम की रेंज में बताया जाता है।
ग्रामीण और अर्ध‑शहरी इलाक़ों में, जहाँ डायलिसिस सेंटर्स कम हैं और बार‑बार यात्रा, खर्च और काम छोड़ने की मजबूरी होती है, वहाँ सर्वाइवल और भी कम हो सकता है, जबकि बड़े निजी या अच्छी तरह संचालित सरकारी कॉर्पस‑फंडेड सेंटर्स में अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम देखे जाते हैं। समग्र रूप से, भारत में डायलिसिस पर रहने वाले मरीजों की जीवन‑प्रत्याशा इस बात पर बहुत निर्भर करती है कि वे कितनी नियमितता से डायलिसिस करा पाते हैं, पोषण और दवाओं का कितना पालन कर पाते हैं, उन्हें इंफेक्शन से कितनी सुरक्षा मिलती है, और क्या समय पर किडनी ट्रांसप्लांट जैसी विकल्पों तक उनकी पहुँच बन पाती है या नहीं।
डायलिसिस के नुकसान (मुख्य दुष्प्रभाव और सीमाएँ)
- बार‑बार लो BP (हाइपोटेंशन), चक्कर, कमजोरी और बेहोशी जैसा महसूस होना।
- मांसपेशियों में तेज़ ऐंठन, सिरदर्द, थकान और बॉडी‑पेन डायलिसिस के दौरान या बाद में।
- बार‑बार सूई लगने और फिस्टुला/कैथेटर के कारण दर्द, नसों पर दबाव और कभी‑कभी फिस्टुला फेल होना।
- संक्रमण का खतरा:
- हेमोडायलिसिस में रक्त‑संक्रमण, सेप्सिस, फिस्टुला साइट पर इंफेक्शन।
- पेरिटोनियल डायलिसिस में पेरिटोनाइटिस (पेट की झिल्ली का गंभीर इंफेक्शन), बुखार, पेट‑दर्द, उलटी।
- दिल पर अतिरिक्त लोड: अनियमित धड़कन, अचानक कार्डियक अरेस्ट, लंबे समय में हार्ट फेल्यर का बढ़ा जोखिम (खासकर हाई‑रिस्क मरीजों में)।
- इलेक्ट्रोलाइट गड़बड़ी: पोटैशियम, सोडियम, कैल्शियम आदि के स्तर में तेजी से उतार‑चढ़ाव, जिससे मांसपेशी व दिल दोनों पर असर।
- एनीमिया, हड्डियों का कमजोर होना, एमाइलॉयडोसिस (लंबे समय तक डायलिसिस से असामान्य प्रोटीन जमा होना) जैसे क्रॉनिक जटिलताएँ।
- कड़ी डाइट और फ्लूइड रिस्ट्रिक्शन: प्यास लगने पर भी पानी सीमित, नमक‑फ्लूइड पर सख्त नियंत्रण, जिससे जीवन‑गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- समय और जीवनशैली की बड़ी कीमत: हफ्ते में 2–3 बार कई घंटों तक मशीन से बंधे रहना, यात्रा, काम‑धंधे पर असर, परिवार पर मानसिक‑आर्थिक बोझ।
- मानसिक प्रभाव: डिप्रेशन, चिंता, “मशीन पर निर्भरता” की भावना, सोशल और पर्सनल लाइफ में सीमाएँ।
इन नुकसानों का मतलब यह नहीं कि डायलिसिस “गलत” है – कई मामलों में यह जीवन बचाने के लिए अनिवार्य होता है – लेकिन यह ज़रूर दिखाता है कि प्रिवेंशन, शुरुआती स्टेज से मेटाबॉलिक/लाइफस्टाइल मैनेजमेंट कितनी ज़्यादा महत्वपूर्ण है, ताकि ज़िंदगी हमेशा के लिए डायलिसिस तक सीमित न रह जाए।